मंजर 1974 के उपचुनाव का था..... सीट समाजवादियों का गढ़ रही बिहार की बांका लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र........सीधा मुकाबला कांग्रेस और समाजवादियों के बीच....1971 में कांग्रेस के टिकट पर चुने गये शिवचंडी प्रसाद सिंह के असामयिक निधन पर खाली हुई सीट से कांग्रेस ने शंकुतला सिंह पर दांव आजमाया था.....बांका की ऊपजाऊ सियासी जमीन पर या यूं कहे पूरे अंगभाषी इलाके में दिग्गज और तेज तर्रार कांग्रेसी के रुप में चन्द्रशेखर सिंह चर्चित हो चुके थे। पटना से लेकर दिल्ली तक के राजनीतिक गलियारों में उनकी साख थी। और इसी वक्त समाजवादी आंदोलन में बिखराव शुरू हो चुका था। जॉर्ज फर्नांडिज और मधुलिमये का खेमा अलग हो चुका था। और राजनारायण तथा जनेश्वर मिश्र आदि संयुक्त् सो्शलिस्ट पार्टी का गठन कर चुके थे।बांका से मधुलिमये ने सांसद के लिए पर्चा भरा। बतौर समाजवादी उनकी जीत के पूरे समीकरण मौजूद थे। लेकिन संयुक्त सोशलिस्ट् पार्टी की तरफ से राजनारायण ने ताल ठोंकी और बांका में समाजवादी तेवर दिखने लगे। लेकिन सियासत ने तब इतनी ओछापन और मलिनता नहीं थी। तभी तो फूलपूर के सांसद जनेश्वर मिश्र जब भितिया पहुंचे तो एक कांग्रेसी विधायक के घर ठहरे। गरमी अपने चरम पर थी।लिहाजा जनेश्वर ने धूप काटने का मन बनाया। दादा जी (चाचाजी के पिताजी, जो गांव के मुखिया भी थे) शकुन्तला देवी के प्रचार को निकले थे। पर चाचा जी तो ठहरे धुर समाजवादी....सो वे जनेश्वर जी की आगवानी में थे......चाचा जी ने उनके लिए पेड़ा मंगाया और गांव के कुंए का ठंडा पानी पिलाया.... वो आराम से पेड़ा खा और पानी पी चौड़ी सी बेंच पर सो गए। मानो कोई गवई मजदूर हो जो दोपहर काटने को थोड़ी देर के लिए सुस्ता गया हो। दोहरे बदन वाले उस निडर और धवल चरित्र के आदमी को देखकर शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह आदमी भारत की सर्वोच्च पंचायत का निर्वाचित सदस्य है और सिर्फ समाजवादी आंदोलन के लोग ही नहीं पूरे हिन्दुस्तान की सियासत में इनका नाम इज्जत के साथ लिया जाता है। और यह बस केवल अपने विचारों के अधीन होकर फूलपूर से हजारों किलोमीटर दूर बांका के भितिया में बेंच पर सोकर दोपहरी काट रहा है।
लिहाजा चाचाजी के मुंह से सुनी इतनी कहानी ही जनेश्वर जी का पहला परिचय था। फिर जब दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ परिसर में पत्रकारिता की क्लास में नामांकन हुआ। और पटना विश्वविद्यालय से सीधा देश के ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले दिल्ली विवि में पहुंच गया तो पहली ही क्लास में प्रभाष जोशी जी का व्याख्यान होना था। मुझे सिर्फ समाजवाद की सनक भर लगी थी। उसका असली स्वाद नहीं चखा था। पांडव नगर से खुलने वाली 740 नंबर की बस पर सवार होकर जैसे ही कनॉ़ट प्लेस पंहुचा और गांड़ी ने ज्यों ही टर्न लिया एक एमपी आवास में बड़े बढ़े लाल रंग के शब्द दिखाई दिए लोहिया के लोग। मानो तन बदन में झंकार की लय आ गई। मैंने सोचा किसने कहा समाजवाद अब अप्रासंगिक है। एक जनेश्वर जी हैं जो देश के दिल दिल्ली की धड़कन कनॉट प्लेस के लगभग बीचों बीच चीख चीखकर कह रहे है हम हैं लोहिया के लोग और हमारे जैसे लोग जब तक रहेंगे समाजवाद जिंदा रहेगा।
अब जब भी शास्त्री भवन के सामने से गुजरता हूं तो सोचता हूं ....बिना लोहिया का कनॉट प्लेस.... बिना जनेश्वर का कनॉट प्लेस.....बस सोचता ही रह जाता हूं कि किसी तरह वो बोर्ड बच पाता। लोगों ने तो अपने विचारों को बनाए रखने के लिए पूरे शहर को सार्वजनिक पार्क बना दिया लेकिन हमें सिर्फ एक बोर्ड चाहिए जनेश्वर की याद के लिए...उनकी संघर्षों की याद के लिए.....